Wednesday, February 19, 2014

चंद पंक्तियां हिन्दी में - A few lines in Hindi

वो प्यार ही क्या जिसमें अकेलापन हो
वो यार ही क्या जो यादों से गुम हो
वो इंतज़ार ही क्या जो खुदके लिए ना हो
वो राज़ ही क्या जो खुदको खुदसे ना छुपाए हो

*****

कोशिश तो की थी हमने
पर भुला ना पाए हम
खुदको खुदसे जोड़के
जुदा ना कर पाए हम

*****

उसकी ख़ूबसूरती तो किरणों का ख़ेल है
वरना चांद तो बेजान मिट्टी का ढ़ेर है

Transliteration

Wo pyaar hi kya jismein akelapan ho
Wo yaar hi kya jo yaadon se gum ho
Wo intezaar hi kya jo khudke liye na ho
Wo raaz hi kya jo khudko khudse na chupaye ho

*****

Koshish to ki thi humne
par bhula na paaye hum
Khud ko khud se jodke
juda na kar paaye hum

*****

Uski khoobsoorati to kirno ka khel hai
Warna chand to bejaan mitti ka dher hai

On the other side of thoughts

Our real potential awaits us
on the other side of thoughts.
Let's go there often.
Come, lets meet there in silence.

The simpler my poetry becomes

The more I evolve,
The simpler my poetry becomes.

Rumi visits me sometimes

Rumi visits me sometimes and whispers in my ears.
Gibran bumps into me often and paints life through my eyes.
Tagore calls in as well and composes mystical symphony.
Tulsidas comes over to recite the greatest poetry ever told.

They all come randomly, and take me over.
They don't knock but knock me over.
They mesmerize me and leave me gasping.
They show me the real me and leave me yearning.

I go there often now
And wait for them to come.
But now they don't come to me,
they come through me.

Saturday, February 01, 2014

मुझसे दोस्ती करोगे

बचपन में काफी दोस्त थे मेरे
जो हमेशा साथ रहते थे
बड़े प्यारे नाम थे उनके :
खेल, मासूमियत, समय और ख़ुशी

मैं बड़ा होता गया
नए दोस्त मिलते गए
पढाई ने हाथ बढ़ाया
कहा मुझसे दोस्ती करोगे ?

क्यों नहीं ? मैंने कहा
मैं तुम्हे ज्ञान दूंगी
पढाई बोली।  ज्ञान के साथ
समझदारी और दुनियादारी भी आए।

दुनियादारी की दोस्ती से
मासूमियत ने मेरी कट्टी कर ली
खूब बुलाने पर भी
उसने एक न सुनी

मैं बड़ा होता गया
नए दोस्त मिलते गए
ज़िम्मेदारी ने हाथ बढ़ाया
कहा मुझसे दोस्ती करोगे ?

क्यों नहीं ? मैंने कहा
मैं तुम्हे आधार दूंगी
वो बोली।  आधार के साथ
बोझ और मजबूरी भी आये

बोझ के तले दब कर
खेल ने दोस्ती तोड़ दी
मस्त चिड़िया की तरह
किसी और डाल पर उड़ चली

मैं बड़ा होता गया
नए दोस्त मिलते गए
पैसे ने हाथ बढ़ाया
कहा मुझसे दोस्ती करोगे ?

क्यों नहीं ? मैंने कहा
मैं तुम्हे शौहरत दूंगा
पैसा बोला।  शौहरत के साथ
काम और नाम भी आये

शौहरत के पीछे भागते हुए
मुझसे ख़ुशी का हाथ छूट गया
नए दोस्तों की होड़ में
फिर एक पुराना यार बिछड़ गया

अब ज़िन्दगी के मायने बदल गए
एक दौड़ सी है, बेचैनी सी
किसने शुरू की, क्यों चलती है
अब कोई ये पूछता नहीं

सब कुछ तो है
फिरभी मानो कुछ नहीं
पैसा भी है शौहरत भी
पर ज़िन्दगी के लिए अब समय नहीं